भारत की पहली Twitter यूजर हूं:ब्लू टिक के पैसे नहीं दूंगी, पौने 2 लाख ट्वीट किए…

इस दौरान मुझे TWTTR (ट्विटर का पहले यही नाम था) से एक इन्वीटेशन मिला। इसमें लिखा था कि हमें पता है कि आप नई-नई सर्विस को जॉइन करती हैं। हमने एक नया सर्विस लांच किया है, आप भी जॉइन करें। मैंने इस पर अकाउंट बना लिया।

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भारत की पहली Twitter यूजर हूं:ब्लू टिक के पैसे नहीं दूंगी, पौने 2 लाख ट्वीट किए…

इस दौरान मुझे TWTTR (ट्विटर का पहले यही नाम था) से एक इन्वीटेशन मिला। इसमें लिखा था कि हमें पता है कि आप नई-नई सर्विस को जॉइन करती हैं। हमने एक नया सर्विस लांच किया है, आप भी जॉइन करें। मैंने इस पर अकाउंट बना लिया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार जब मैंने यूज किया तो देखा कि इस पर कैलिफॉर्निया, टेक्सास, फ्लोरिडा के लोगों के अकाउंट हैं, इंडियन कोई है ही नहीं। लोग ट्वीट करते, चलो कॉफी पीकर आते हैं, पिज्जा खाकर आते हैं। मैं क्या करती, मैं धीरे-धीरे इससे कट गई। 2008 में अचानक से भारत में भी लोगों के मुंह से ट्विटर के बारे में सुनने लगी। तब मैंने चेक किया तो पता चला कि मैंने तो अकाउंट बना रखा है। इसके बाद मैंने ट्विटर यूज करना शुरू किया। कभी सोचा नहीं था लेकिन अब तक 1 लाख 76 हजार ट्वीट मैंने किए हैं।

जब तक स्थिति साफ नहीं होती, ब्लू टिक के लिए पैसे नहीं दूंगी

मीडिया में मुझसे बार-बार पूछा जा रहा है कि क्या मैं ब्लू टिक के लिए पैसे दूंगी। तो मेरा जवाब है कि जब तक क्लैरिटी नहीं होती है तब तक ब्लू टिक के लिए पैसे नहीं दूंगी। अभी ऊहापोह की स्थिति है। मेरा मानना है कि एलन मस्क भी यह तय नहीं कर पा रहे कि करना क्या है। पहले किसी के अकाउंट की आईडी देखकर या सोशल मीडिया पर उसके इंफ्लुएंस को देखकर ट्विटर एप्रूव कर ब्लू टिक देता था। लेकिन अब इसका पर्पस क्या है पता नहीं चलता।

कुछ दिन पहले ट्विटर ने ऑफिशियल बैज भी शुरू किया था यह बताते हुए कि इनका अकाउंट ऑफिशियल है। लेकिन यह भी एक्सपेरिमेंट के तौर पर ही था जिसे हटा लिया गया। एड बेस्ड सब्सक्रिप्शन की बात भी कही जा रही है। लेकिन मुझे लगता है कि ट्विटर पर एड का एल्गोरिदम बेकार है। इन सब चीजों को देखकर ही आगे कुछ किया जा सकता है।

पापा को देखकर फोटोग्राफी करना जाना

पापा आर्मी में थे। लेकिन मैं पापा को ओरिजिनल फोटोग्राफर मानती हूं। उन्हें देख-देखकर सीखा कि फोटोग्राफी कैसे करनी है। बचपन में जब वो घर पर नहीं होते थे, कैमरा उठा लेती थी। फोटो खींचने लगती थी। कभी सोचा नहीं था कि फोटोग्राफर बन पाऊंगी। महंगे कैमरे एफॉर्ड करना तो बहुत दूर की बात है। जब 10 वीं में थी तब प्वाइंट एंड शूट कैमरा लिया था।

मुंबई में नौकरी से शुरुआत, वेबसाइट करती थी डिजाइन

2004 में मुंबई में मैं नौकरी करने लगी। वहां पहला ब्लॉग शुरू किया। ग्रैफिक डिजाइन करती थी। वेबसाइट बनानी आती थी। कुछ क्लाइंट के लिए बनाई भी। उससे जब पेमेंट मिले तब कैमरा खरीदा। जब पहली बार डिजिटल कैमरा रिलीज हुआ तो भी एक्साइटेड रही। भारत में निकोन D90 कैमरे की बॉडी एक लाख में आती थी। ऑस्ट्रेलिय में मेरे दोस्त ने बताया कि वहां आधी कीमत में मिल रही है। उसने मुझे वहां से डिजिटल कैमरा भेजा।

मिस्ट्री शैंपू कांटेस्ट जीत कर खरीदे प्रोफेशनल लेंस

2009 में शैंपू बनाने वाली एक कंपनी ने मिस्ट्री शैंपू कांटेस्ट कराया। तब कांटेस्ट में जो भी पार्टिशिपेंट्स थे, उनमें से मुझे छोड़ कर किसी के पास ब्लॉग नहीं था। मैंने अपने ब्लॉग का इस्तेमाल किया। फोटो डालती और बताती कि आज मेरे बाल कैसे लग रहे। मैं वो कांटेस्ट जीत गई। उससे मिले पैसों से मैंने दो प्रोफेशनल लेंस खरीदे।

इसके बाद मैंने खुद को फोटोग्राफर बोलना शुरू किया। फिर तीन-चार साल तक वेडिंग फोटोग्राफी करती रही। धीरे-धीरे लोगों ने जानना शुरू किया, एसाइनमेंट मिलने लगे। लाइफस्टाइल पर ही फोकस था, इसलिए ट्रैवल, फैशन, प्राइवेट इवेंट्स सबमें फोटोग्राफी के अवसर मिले। अब तो क्लाइंट फोन कर कहते हैं कि आप आइए।

बचपन से क्रिएटिव रही, पेरेंट्स ने हमेशा मोटिवेट किया

पापा आर्मी में थे तो अलग-अलग शहरों में रहना हुआ। काफी स्कूल बदले। इसका फायदा यह हुआ कि बहुत लोगों से मिली। कल्चर एक्सपोजर हुआ। नए-नए दोस्त बनाए। नई जगहें देखने को मिली। इससे मेरे अंदर की क्रिएटिविटी को पर लग गए। बचपन से ही स्केचिंग, ड्राइंग करती थी। नाटकों में भाग लेती थी। पढ़ाई-लिखाई में एवरेज थी, लेकिन पेरेंट्स ने हमेशा प्रोत्साहित किया।

2017 में घूमने आई जैसलमेर, यहीं नौकरी करने लगी

मैं 2017 में एक इंफ्लुएंसर के रूप में जैसलमेर आई थी। वहां के एक होटल में गेस्ट के रूप में ठहरी। लेकिन मुझे लगा कि घर आ गई हूं। मुझे होटल से प्यार हो गया था। पापा की भी जैसलमेर से यादें जुड़ी थीं। तो बार-बार जैसलमेर-बीकानेर आती रही। पिछले साल दिवाली के समय सीनयर्स ने कहा कि आप हमारे साथ काम क्यों नहीं करते। मैंने तब यही सोचा कि दो-तीन महीने का कांट्रैक्ट कर पाऊंगी, अब जैसलमेर में काम करते एक साल पूरे होने वाले हैं।

जैसेलमेर बहुत पुराना है। कई हेरिटेज साइट्स हैं। यहां मैं गेस्ट एक्सपीरियेंसेज को देखती हूं। जैसे-डिनर आन द ड्यून, सैंड ड्यूंस। गेस्ट सनसेट में डिनर करते हैं। उनके खाने की प्रिफरेंस क्या है ये सारी डिटेल्स डील करती हूं। पूरी दुनिया से यहां लोग आते हैं।

सोशल मीडिया को अब रिप्लीकेट करना मुश्किल

मुझे ऐसा लगता है कि जिन सोशल मीडिया ने शुरू में पैर जमा लिए अब उनका बाहर होना मुश्किल है। लोग दूसरे प्लेटफॉर्म पर नहीं जाएंगे। जैसे-जब क्लब हाऊस लांच हुआ था तब काफी रोचक था। मैं इस पर एक्टिव भी रही, लेकिन अब बंद पड़ा है। दरअसल, उन्हीं सोशल मीडिया पर जाते हैं जहां सब रहते हैं।

फेक अकाउंट है या सही, अब पता नहीं चलता

लोगों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपना बना लिया है। अब कई तरह के एजेंडे चलते हैं। बिजनेस ओरिएंटेड भी है। पहले कभी सोचा भी नहीं था कि फेक अकाउंट भी होगा। पर अब तो समझ में नहीं आता कि फेक अकाउंट कौन है और कौन सही अकाउंट।

इंटर्नशिप के पैसे से खरीदे थे जूते और जींस

मुझे याद है कि कॉलेज में जब एमबीए खत्म किया था, इंटनशिप के पैसे से जूते और जींस खरीदे थे। मैं फैशन की जिन चीजों को अपनाती हूं उसके पीछे मेरी बहन आकांक्षा रिढ़ू है। वह भी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर है।

बाल शेव किया तो आइडेंटिटी बन गई

जब मैंने बाल शेव किया तो यह मेरी पर्सनालिटी का एक पार्ट बन गया। आठ-नौ साल पहले सिर पर बाएं और दाएं ओर की बाल को शेव किया, बीच में बाल छोड़ दिया। यह भी मेरी एक नई आइडेंटिटी बन गई। दोस्तों ने कहा स्मार्ट लग रही हो। लेकिन यह सब मैं स्टाइल स्टेटमेंट के लिए नहीं करती।

सोशल मीडिया ने हमें वॉयस दिया है

मैंने अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रिया, इटली आदि देशों की यात्राएं की हैं। मैं अपने अनुभव से कह सकती हूं कि मॉडर्न इंडिया की महिलाएंं दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले आगे हैं। कुछ चीजों में यहां भी कमी हो सकती है और वहां भी। पर वास्तव में बहुत कुछ बदलाव हुआ है। इसमें सोशल मीडिया का भी बड़ा योगदान रहा है। सोशल मीडिया पर महिलाओं की बात सुनी जा रही है। उनकी ओपिनियन को जगह दी जा रही है। उनकी परेशानियां साझा की जा रही हैं। यह सब इसलिए कि बदलाव होगा।