तालिबान (taliban) कैसे है महिलाओ के लिए नर्क… जानिए महिला पत्रकार की जुबानी

तालिबान (taliban) कैसे है महिलाओ के लिए नर्क... जानिए महिला पत्रकार की जुबानी

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तालिबान (taliban) कैसे है महिलाओ के लिए नर्क… जानिए महिला पत्रकार की जुबानी

26 अगस्त यह वह तारीख है जो अफगानिस्तान के इतिहास को एक बार फिर से दोहराई है, जी हाँ तालिबान (taliban) ने काबुल पर अपना पूर्णतः कब्ज़ा जमा लिया है. जहाँ सरिया कानून के नाम पर महिलाओ के साथ अत्याचार किया जा रहा है. जिससे महिलाये अपनी आजादी को खोते देख अपने देश को छोड़ कर भागना चाहती है ऐसी ही एक महिला जो अफगानिस्तान से भागने में सफल रही है. जी हाँ हम बात कर रहे है हुमैरा कादरी की जिन्होंने अपनी आजादी के लिए अपने देश को छोड़ना ही बेहतर समझा.

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक आपको बता दे कि हुमैरा कादरी एक लेखिका और महिला और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। है जिन्होंने तालिबान के खिलाफ कई किरबे लिखी हैं.
हुमैरा कादरी लिखती है कि – ”मैं डरी नहीं हूं, लेकिन गुस्से से सुलग रही हूं, दुनिया के तालिबान (taliban)को स्वीकारने की सबसे बड़ी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ रही है”
अफगानिस्तान के लिए एक मनहूस तारीख जो 13 अगस्त के रूप में आयी थी, इस दिन तालिबान (taliban) ने हेरात पर कब्ज़ा कर लिया, इस घटना के बाद हमे अपने जीवन के सुनहरे पल मिटते नज़र आ रहे थे, हमसे हमारी आजादी छिनती नज़र आ रही थी, हम हकीकत पर यकीं नहीं कर पा रहे थे इस से पहले जब तालिबान(taliban) ने हेरात पर हमले शुरू किये थे तो हमे यकीन नहीं था कि इतना जल्दी यह शहर भी तालिबान (taliban) के कब्जे में आ जायेगा हेरात में हमले के 2 दिन बाद ही काबुल पर हमला किया गया और कब्ज़ा कर लिया गया |

15 अगस्त 2021, सुबह के 11 बज रहे थे और मुझे लग रहा था कि में किसी अँधेरे कुवे की गहराई में गिरती जा रही हूँ, जहाँ से खुले छोर कि तरफ भी रोशनी नजर नहीं आ रही थी, लगभग शहर के सभी लोगो ने अपने घरों के खिड़की दरवाजे बंद कर खुद को घरों में कैद कर लिया था, लेकिन में वो सब देखना चाहती थी जो तालिबान(taliban) के द्वारा दहसत का माहौल बनाया गया था, मेरा डर हकीकत में बदल गया था। वे काबुल की सड़कों पर हाथों में हथियार लिए चल रहे थे।
ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वे 20 साल बाद अपनी कब्रों से उठ कर वापस आये हो, उनकी वही सुरमा लगी आंखें थीं, वही बिखरे लंबे बाल। उन्हें देखते हुए मैं सोच रही थी कि काश मैं मर चुकी होती और दूसरी बार अपने देश कि यह दशा देखनी न पड़ती। उस दिन मैंने यह निर्णय लिया कि मैं अपना देश छोड़कर नहीं जाऊंगी, मैंने अपनी आवाज उठाने का फैसला किया। रो-रोकर मेरी आंखें सूज चुकी थीं। मेरा गला भर चुका था, लेकिन फिर भी जिस किसी पत्रकार ने मुझसे संपर्क किया, मैंने उससे बात की।
उन मुश्किल हालात में मुझे भरोसा देने के लिए मेरे अम्मी-अब्बा गांव से काबुल आ गए थे। मेरे पिता ने भरोसा दिया कि डरो मत, तुम्हें कुछ भी नहीं होगा। मैं डरी हुई नहीं थी, लेकिन गुस्से और दुख से मैं भीतर ही भीतर सुलग रही थी। ऐसा लग रहा था मानों हमें बेच दिया गया हो। और अब दुनिया के तालिबान को स्वीकार करने के फैसले की सबसे बड़ी कीमत हम महिलाओं को चुकानी थी।

मैं काबुल और अफगानिस्तान के हालात के बारे में बताती और रात भर रोती रहती। मैं बस यह चाहती थी कि दुनिया अफगानिस्तान के लोगों का दर्द समझे, यहां की औरतों का दर्द समझे, समझे कि हमें कितने सस्ते में बेच दिया गया है और हमारी हालत कितनी दयनीय है।

मेरे पास काबुल से निकलने का मौका था लेकिन में अपने लोगो कि सुरक्षा और उनको निकलने के लिए वहा रुकी रही मैं पहले भी अमेरिका में रह चुकी हूं। मुझे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रेडक्लिफ इंस्टीट्यूट से फैलोशिप मिली थी, और मुझे वैसे भी 1 सितंबर को हार्वर्ड पहुंचना ही था। मेरे पिता मुझे जबरदस्ती देश छोड़ने के लिए कह रहे थे,आखिरकार मुझे अपने पिता की जिद और अपने बच्चे की जान की खातिर काबुल छोड़ना पड़ा।

मैं काबुल हवाई अड्डे की तरफ बढ़ रही थी। जान बचाकर भाग रहे लोगों के बीच तालिबान के पथरीले चेहरे दिखाई दे रहे थे।
हमें एक सैन्य विमान से कतर पहुंचाया गया, हमें एक भीड़भाड़ वाले कैंप में रखा गया जहां बहुत गर्मी थी। महिलाएं इकट्ठा होतीं और अपने उन लोगों के बारे में बात करतीं जिन्हें वे पीछे छोड़ आई हैं। वे लगातार रोती जाती थीं। बच्चों को हंसता-खेलता देख मेरी आंखों से आंसू निकल पड़ते। मेरा 8 साल का इकलौता बच्चा कई ऐसे सवाल पूछता जिनका जवाब देना मेरे लिए मुश्किल हो जाता।
वह पूछता, ”मां तालिबान ने हमारे देश पर कब्जा क्यों कर लिया? मां, तालिबानी आपको मारना चाहते हैं? क्योंकि आपने उनके खिलाफ किताब लिखी है।” और मेरे पास उसके सवालो के कोई जवाब नहीं थे।

यहां आकर भी यही लग रहा था कि मैं एक बार फिर दुख और दर्द के अंधेरे कुएं में गिर गई हूं।अमेरिका के सैन्य विमान में कई हवाई अड्डों पर उतरने और कैंप में रहने के बाद अब मैं टेक्सास पहुंच गई हूं। यहां भी मेरी रातें अपना घर छोड़कर आई महिलाओं के विलाप और अपने खिलौने और अपनी दुनिया छोड़कर आए बच्चों के दुःख से भरी हैं।

मेरे भीतर अब भी हजारों सपने हैं, उनमें सबसे बड़ा सपना फिर से काबुल लौटना है।मैं अपने फोन की फोटो अलबम देखती हूं, अपनी जिंदगी के बीते पलों में लौटती हूं और मेरी आंखें गीली हो जाती हैं। किसी अजनबी देश में पूरी जिंदगी बिता देना आसान नहीं है। मेरी किताबें काबुल में छूट गई हैं। तालिबान मेरी किताबों के साथ क्या करेंगे? मेरे अपने लोग काबुल में रह गए हैं, तालिबान मेरे अपने लोगों के साथ क्या करेंगे?