अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा घर की महिलाओं से मिली… Mahatma Gandhi

अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा घर की महिलाओं से मिली... Mahatma Gandhi

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Mahatma Gandhi
Mahatma Gandhi with manu and abha

जिस तरह के हालत आज देखने को मिल रहे है हमें आज बापू के विचारों पर फिर से गौर करने का समय है। महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की महिलाओं के बारे में जो सोच है, उसे उनकी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ के तौर पर ज्यादा जोड़ कर देखा जाता है, उस दौर में भी उनकी सोच महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर जितनी सुदृढ़ थी.

आज ऐसा दौर चल रहा है कि महिलाओं पर किये जाने वाले अत्याचार के मामलों की खबर सोशल मीडिया पर बनी रहती है बापू का 99 साल पहले 15 सितंबर 1921 को यंग इंडिया में लिखा वक्तव्य आज भी सही प्रतीत होता है, आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है, उनमें सबसे घटिया नारी जाति का दुरूपयोग है।

आज के समाज की महिलाओं को लेकर सोच –
अगर हम सच्चाई देखे तो आज भी लोगों सोच में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिलेगा बल्कि दिन ब दिन महिलाओं के साथ अपराध बढ़ता ही जा रहा है, इसका जिम्मेदार हम लोगों की बिगड़ती मानसिकता को मान सकते है, पुरुषवादी मानसिकता ने महिलाओं को भोग की वस्तु और अपना गुलाम ही समझा है। गांधी (Mahatma Gandhi) जी का साफ साफ कहना था कि वे अगर महिला होते तो पुरूषों द्वारा किए गए अत्याचार को कतई बरदाश्त नहीं करते। 

बापू के अनुसार सीता और द्रौपदी को नारियों में आदर्श…
बापू के अनुसार सीता और द्रौपदी को नारियों में आदर्श माना है इसलिए नहीं कि ये धार्मिक पात्र हैं, बल्कि इसलिए कि ये दोनों साहसी थीं और दोनों अपने साथ हुए अपराध का विरोध करना जानती थीं। महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) जी हमेशा धर्म और आस्था में अपना यकीन रखा है, गाँधी जी ने हमेशा कुरीतियों का विरोध किया। उनका कहना है कि परंपराओं की नदी में तैरना अच्छी बात है लेकिन उसमें डूब जाना आत्महत्या के समान है।

अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा अपनी मां और पत्नी से मिली-
उन्हें अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा अपनी मां और पत्नी से मिली। उनका यह भी मानना था कि दांडी मार्च और सत्याग्रह महिला कार्यकर्ताओं की वजह से ही सफल हो पाया। गांधीजी महिलाओं को सशक्तीकरण के विषय के रूप में नहीं देखते थे, उनका मानना था कि महिलाएं स्वयं इतनी समझदार व साहसी है कि खुद की ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन अगर महिलाओं को आजाद होना है तो उन्हें निडर बनना होगा। समाज के डर की परवाह किये बगैर उसे अपने हक़ की लड़ाई व उनपर थोपे गए अन्याय का विरोध करना ही उन्हें जुल्मों से मुक्ति दिला सकता है। 

महिलाओं के मतदान पर गाँधी जी-
वर्ष 1921 में जब महिलाओं के मतदान का मुद्दा उठाया गया तो उन्होंने इसका भरपूर समर्थन किया। 2 मई 1936 के हरिजन में भी गांधी जी ने देश की शिक्षा पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए स्पष्ट कहा था कि स्त्री इतनी सशक्त हो जाए कि अपने पति को भी ‘न’ कहने में संकोच न हो। महिलाओं को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिए। उनके साथ हो रहे गलत व्यवहार का जब तक वो जवाब नहीं देंगी उनके साथ गलत होता रहेगा, गाँधी जी का कहना था कि जब एक महिला रात में सड़कों पर स्वतंत्र रूप से चलने लगेगी, उस दिन से हम कह सकते हैं कि भारत ने स्वतंत्रता हासिल कर ली है।