बाइक चलाने से कई बार शादी टूटी, मेहनत से कमाया हुआ नाम सिर्फ शादी के लिए कुर्बान कर दूं…Burqa Rider

बाइक चलाने से कई बार शादी टूटी, मेहनत से कमाया हुआ नाम सिर्फ शादी के लिए कुर्बान कर दूं...Burqa Rider

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Burqa Rider
आयशा आमीन ( Burqa Rider)

आइये आज आपको आयशा आमीन (Burqa Rider), की कहानी से रूबरू करवाते है, कैसे आयशा (Burqa Rider) ने समाज के लोगो की सोच की परवाह किये बगैर अपने शौक और दीवानगी के साथ अपने पैशन को फॉलो किया. आयशा आमीन (Burqa Rider) जानी-मानी बाइक राइडर हैं। लोग उन्हें बुर्का राइडर के नाम से जानते हैं। कई बड़े इवेंट में वे पार्टिसिपेट कर चुकी हैं। उन्होंने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं…

मैं आयशा आमीन (Burqa Rider), सऊदी अरब के जेद्दाह में मेरा जन्म हुआ। परिवार में मम्मी-पापा, 5 बहनें और एक भाई। मैं उनमें सबसे छोटी। बचपन में मेरी बाकी बहनें खेलने के लिए गुड़ियां, टी सेट जैसे खिलौने खरीदा करती थीं, लेकिन मैं हमेशा बाइक ही खरीदती थी। बाइकिंग के लिए मेरा शौक और मेरी दीवानगी इस कदर रही कि इसकी वजह से कई बार मेरी शादी तक टूट गई।

साल 2006 में जेद्दाह में मैंने धूम फिल्म देखी। उसमें लड़कियां जिस तरह से बाइकिंग करती और रेस लगाती, उस घूं…घूं… घूं.. की आवाज से मेरे रोंए खड़े हो जाते थे। फिर मैंने फास्ट एंड फ्यूरियस फिल्म देखी तो मेरी दीवानगी और बढ़ गई। मैं दिन-रात सोते जागते बाइकिंग के बारे में ही सोचने लगी, लेकिन परवान चढ़ते सपनों के बीच एक मुसीबत भी थी। दरअसल जेद्दाह में लड़कियां बाइक नहीं चलाती थीं, सख्त मनाही थी। हालांकि मेरी दीवानगी कम नहीं हई।

हम बहनों की शादी भारत में ही करनी थी। यहाँ पापा का यहां जमा जमाया रेस्टोरेंट था, और हमने अपना सारा सामान पैक किया और 2009 में लखनऊ आ गए। तब मेर करीब 12 साल रही होगी।

यहां आने के बाद भी मेरी बाकी बहनें आम मुस्लिम लड़कियों की तरह ही सोचती थीं, लेकिन मेरे दिमाग में एक ही फितूर था कि अब तो मैं बिना रोक-टोक के बाइक चला सकती हूं। कुछ साल बाद मेरे भाई ने एक बाइक खरीदी। तब मुझे ऐसा लगा जैसे बाइक मैंने ही खरीदी है। अंदर ही अंदर खुशी से पागल हुई जा रही थी, लेकिन अपने दिल की बात मैंने किसी को नहीं बताई। डरती थी कि कहीं इस वजह से मुझे डांट न दे और मैं इस सपने को जीना बंद न कर दूं। पांच बहनों और एक भाई के बीच परिवार में मैं सबसे छोटी थी। बचपन से ही मम्मी-पापा का मुझे काफी सपोर्ट मिला।

और अब घर में बाइक आ गई थी। जब कभी आस-पास कोई नहीं होता तो मैं बाइक के पास जाकर उसे सहलाती, देखती रहती। जब भैया सो जाते थे तो मैं उनके कमरे में से बाइक की चाबी लेकर उसे स्टार्ट करके देखती, उसके पुर्जों को समझती। उसे साफ करती। घरवालों से चोरी-छिपे मेने धीरे धीरे बाइक स्टार्ट करना और उसके ऊपर बैठना शुरू कर दिया।जब भी बाइक पर मैं भैया के साथ कहीं जाती तो मेरी नजर बस वही टीकी रहती थी कि वे क्लच कैसे दबा रहे हैं, गियर कब बदल रहे हैं।

एक बार अखबार में एक विज्ञापन छपा कि एक वह महिलाओं की रैली करवा रहा है। मुझे लगा कि इससे अच्छा मौका अब नहीं मिल सकता है। मैं डरते-डरते ही सही अखबार की कतरन लेकर भैया के पास गई। मैंने उनसे कहा कि इस बाइक रैली में हिस्सा लेना चाहती हूं। मुझे बाइक चलानी सीखनी है। पहले तो वे हैरान हुए, लेकिन थोड़ा बहुत समझाने के बाद वे मुझे बाइक सीखाने के लिए राजी हो गए। जब ये बात पापा को मालूम हुई तो वे काफी ज्यादा नाराज हो गए।

पापा ने नाराजगी के साथ कहा कि लोग क्या कहेंगे कि आमीन की बेटी क्या कर रही है? रिश्तेदार क्या कहेंगे? समाज क्या कहेगा? बुर्का पहनकर बाइक सीखोगी कैसे और चलाओगी कैसे ? अगर बाइक चलाते हुए बुर्का फट गया या उसमें साइलेंसर की वजह से आग लग गई तो यह बुर्के की भी बेअदबी होगी। वे कहते थे कि एलियन लगोगी बुर्के में बाइक चलाते हुए। हमारे खानदान में कभी किसी लड़की ने ऐसा नहीं किया, हमारी बेइज्जती हो जाएगी। तुम्हें कोई बाइक-वाइक नहीं चलानी है।

मेरी मां ने मेरा साथ दिया। शायद उन्हें अपनी जवानी में बाइक चलाने का मन रहा हो और वे चला नहीं पाईं। उन्होंने पापा से कहा कि मैं वादा करती हूं कि यह बुर्का पहनकर बाइक चलाएगी। कभी इस आजादी का फायदा नहीं उठाएगी। इसकी हर तरह की जिम्मेदारी मैं लेती हूं। इसे बाइक सीखने और चलाने की इजाजत दे दीजिए। बड़ी मिन्नतों के बाद पापा आखिरकार मान गए। मैंने पापा से वादा किया कि बुर्के को कमर पर धोती की तरह बांध लूंगी, बुर्का कभी बाइक में नहीं फंसेगा।

अब भैया के साथ मैं बाइक सीखने लगी। मैंने 20 की स्पीड से बाइक सीखनी शुरू की, क्लच, हैंडल, बैलेंस सीखा। आखिरकार वह दिन भी आया जब मुझे बाइक रैली में जाने का मौका मिला। मैं बुर्का पहनकर रैली में चली तो गई, लेकिन वहां असहज महसूस करने लगी। हर किसी की नजर मेरे ऊपर ही थी। मुझे लगा कहीं सच में मैं एलियन तो नहीं लग रही। मैं कांपने लगी, हिचकियां आने लगीं। एक बार जब मैंने रैली में भाग लिया उसके बाद तो हर जगह मेरी चर्चा होने लगी, मीडिया में लगातार कवरेज मिलने लगी।

मुझे लगा कि हर कोई मुझे ही देख रहा है। कोई मेरा नाम पूछ रहा था तो कोई पूछ रहा था तो कोई पता। तभी किसी ने मुझे बुर्का राइडर कहा। रैली शुरू हुई, मैंने बहुत आसानी से बाइक चलाया और रैली में हिस्सा लिया। अगले दिन अखबारों के फ्रंट पेज पर मेरी तस्वीर छपी। हर जगह मैं बुर्का बाइकर, बुर्का राइडर के नाम से मशहूर हो गई।

इस तरह वक्त बीतता रहा। मैं छोटी मोटी जगहों पर बाइक चलाने लगी। साल 2017 की बात है। मुझे वर्तिका जैन का फोन आया। वर्तिका भी उसी वीमेन रैली में थी जिसमें मैंने हिस्सा लिया था। उन्होंने मुझसे कहा कि ‘लखनऊ बाइकरनी’ नाम से महिला बाइकर्स का ग्रुप है, तुम उसकी मेंबर बन जाओ। मैं तो दुनिया भर की वीमेन बाइकर्स से जुड़ना ही चाहती थी। लिहाजा मैं ‘लखनऊ बाइकरनी’ ग्रुप की मेंबर बन गई। मैंने इस ग्रुप के साथ पहली राइड लखनऊ से इलाहाबाद होते हुए बनारस तक की। यह राइड बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ स्लोगन के साथ की और यूपी सरकार ने उसे स्पॉन्सर किया था।

हम रात में भी राइड करते थे। हाईवे पर बाइक चलाते देखकर ट्रक वाले रुक जाते थे। कुछ तो गंदा कॉमेंट करते थे। हवा में बाइक चलाते हुए बुर्का उड़ता तो लोग उड़न खटोला कहते थे। कुछ घटिया लोगों ने तो हाईवे पर मुझे गिराना भी चाहा। मेरे साथ पहला हादसा हुआ तब मैं गिरी तो नहीं, लेकिन मेरा खून सूख गया। फिर हमने तय किया कि अब हम लोग रात में बाइक नहीं चलाएंगे। इसके बाद तो लखनऊ से जयपुर, लखनऊ से आगरा, लखनऊ से लद्दाख, लखनऊ से बिहार, नैनीताल हर जगह हम बाइकिंग करने लगें।

बाइक चलाने को लेकर कई बार लोगों से काफी कुछ सुनने को मिलता था, लेकिन मैंने अपना पैशन नहीं छोड़ा।
मुझे मीडिया में लगातार कवरेज मिल रही थी। मैं उसी के नशे में थी। इस बीच मेरे रिश्तेदारों ने पापा को बहकाना शुरू किया। उनके काम भरने शुरू किए। ‘अरे लड़की है, इतनी छूट न दो, लड़की हाथ से निकल जाएगी, नजर रखो। शादी के बाद इसके पैर घर में नहीं टिकेंगे, खानदान में थू-थू हो जाएगी।’ यह सब लगातार चलता रहा। इस बीच मेरी ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी पूरी हो गई। पापा ये सब ताने सुनकर कभी-कभी ऐतराज भी जताते थे, लेकिन मम्मी उन्हें संभाल लेतीं थीं।

खैर 24 साल की होते-होते कई सारी चीजें बदल गईं। जिस परिवार ने मुझे बाइकिंग के लिए इतना सपोर्ट किया उसी ने मुझसे कहा कि तुम्हें बाइकिंग छोड़नी होगी। तब मेरे लिए रिश्ते भी आने लगे थे। पहला रिश्ता आया। लड़के वाले मुझे देखने आए। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं नॉन वेज खाती हूं? मुझे नॉन वेज बनाने आता है? घर का सारा काम आता है या नहीं ? सब ठीक रहा, लेकिन कुछ दिन के बाद लड़के वालों की तरफ से फोन आया कि बाकी सब तो ठीक है, आपकी बेटी भी पसंद है, लेकिन वह बाइक चलाती है। इसलिए हम यह शादी नहीं कर सकते हैं। हमें लगा कि कोई बात नहीं यहां नहीं तो कहीं और शादी हो जाएगी।

हालांकि यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। लड़के वाले आते, चाय-नाश्ता करते और ढेर सारे सवाल करके चले जाते। कुछ दिन के बाद शादी के लिए यह बोलकर मना कर देते कि हमें बाइक चलाने वाली बहू नहीं चाहिए, पर्दे में रहने वाली चाहिए। अब मेरे मां-पापा परेशान हो गए। मुझे लेकर उनकी चिंता बढ़ गई। पापा के साथ मां भी मेरे लिए सख्त हो गईं। दोनों ने मुझसे कहा कि मैं बाइकिंग बंद कर दूं, अपने सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दूं। क्योंकि इस बाइकिंग की वजह से इतने अच्छे-अच्छे रिश्ते छूट गए।

जब लड़के बाइक चला सकते हैं तो लड़कियां भी चला सकती हैं। अब तो लड़कियां बुलेट और सुपर बाइक भी चला रही हैं।
मैंने अपनी मां से पूछा कि बाइक चलाने में परेशानी क्या है? मां बोलती कि लड़के वाले कहते हैं कि लड़की बाइक चलाती है तो काफी तेज होगी। हमारा लड़का लेकर भाग जाएगी। घर तबाह कर देगी। बहुएं पर्दे में ही रहती हैं न कि बाइक चलाती हैं।

अब मेरे सामने सवाल था कि जिस सपने को मैंने सालों से जिया है, इतनी मेहनत की है, नाम कमाया है, उसे सिर्फ शादी के लिए कुर्बान कर दूं…. नहीं यह नहीं हो सकता है। मैंने अपने घर में ऐलान कर दिया कि मुझे ऐसे रिश्ते चाहिए ही नहीं जो अपना गुलाम बनाकर रखें। मेरे किसी सपने या पैशन से किसी की इज्जत चली जाती है तो ऐसी शादी की मुझे जरूरत ही नहीं है। न तो मैं बाइकिंग छोड़ूंगी न अपने सोशल मीडिया अकाउंट बंद करूंगी। शादी नहीं होगी तो देशभर की यात्राएं करते हुए सारी जिंदगी गुजार दूंगी।

उसके बाद मैंने अपनी बाइक को ही अपना हीरो बना लिया। सोच लिया था कि अब इसके संग ही जिंदगी गुजार दूंगी, लेकिन इसी 22 जनवरी को मेरा निकाह एक ऐसे व्यक्ति के साथ हुआ जिसने मुझे मेरे पैशन के साथ स्वीकार किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरी बीवी मेरी पहचान है। अब तक मैं बुलेट से लेकर सुपर बाइक तक चला चुकी हूं। कई बार तो मेरी रफ्तार 200 के पार भी पहुंच जाती है।

मैं तो लोगों से कहना चाहती हूं कि जैसे पिछले जमानों में औरतें रथ चलाती थीं, तीर चलाती थीं, घोड़ा चलाती थीं, तो कोई कुछ नहीं बोलता था। ऐसे ही नए जमाने में बाइक है। यह नए जमाने का हथियार और रथ है। इसे चलाने वाली लड़कियां तेज या बिगड़ी हुई या घर उजाड़ने वाली कैसे हो सकती हैं। बुर्का न छोड़ने की वजह यह थी कि मैं समाज में यह मैसेज देना चाहती थी कि बुर्के में भी हम वो सब कर सकते हैं जो करना चाहते हैं। बुर्का पहनने वालीं मॉर्डन होती हैं, नए से नए काम करती हैं। मैं डिजिटल मार्केटिंग का कोर्स कर रही हूं। मैं बताना चाहती हूं कि हिजाब रुकावट नहीं है।