कुरान ने आदमी औरत में फर्क नहीं किया तो औरत मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकती-सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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मस्जिद Mosque

महिलाओं का मस्जिद (mosque) में प्रवेश और आदमियों के साथ नमाज अदा करने की आजादी के लिए केरल उच्च न्यायालय में एक हिंदूवादी संगठन ने जनहित याचिका दायर कर अनुरोध किया था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट मामले में सुनवाई के लिए तैयार हो गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि मुस्लिम महिला श्रद्धालुओं को भी नमाज के लिए पुरुषों के साथ मस्जिदों(mosque) में प्रवेश मिले।
उसने कहा कि महिलाओं को मस्जिदों में मुख्य उपासना सभागार में प्रवेश और नमाज नहीं पढ़ने देने से उनके साथ भेदभाव किया जाता है. स्वामी देथात्रेय साई स्वरुप नाथ ने यह याचिका दायर की है. वह अखिल भारत हिंदू महासभा की केरल इकाई के अध्यक्ष हैं।

कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार सेंट्रल वक्फ काउंसिल और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को नोटिस भी जारी किया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि राज्य का अधिकार देने का कर्तव्य है लेकिन क्या कोई व्यक्ति (नॉन स्टेट एक्टर) संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दूसरे व्यक्ति से समानता का अधिकार मांग सकता है? मस्जिद या चर्च क्या स्टेट (राज्य) हैं और इस मामले में स्टेट कहां शामिल है? कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले को सबरीमला की वजह से सुन रहे हैं।

गौरतलब है कि बीते दिनों केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था और मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को हरी झंडी दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना समता के अधिकार और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है.

पीठ का कहना था कि मंदिर एक पब्लिक प्लेस है और हमारे देश में प्राइवेट मंदिर का कोई सिद्धांत नहीं है। यह पब्लिक प्लेस है और सार्वजनिक जगह पर यदि पुरुष जा सकते हैं तो महिलाओं को भी प्रवेश की इजाजत मिलनी चाहिए।

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इतना ही नहीं जिन महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति थी, उन्हें भी अपने साथ आयु प्रमाणपत्र लेकर जाना होता था। चेकिंग के बाद ही उन्हें अंदर जाने की अनुमति दी जाती थी। इंडियन यंग लॉयर्स असोसिएशन ने एक जनहित याचिका दायर कर सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत मांगी थी।

आपको बता दें कि महाराष्ट्र के दंपति यास्मीन जुबेर अहमद पीरज़ादा और जुबेर अहमद पीरज़ादा की याचिका मे सबरीमला की तर्ज पर सबको लैंगिक आधार पर भी बराबरी का अधिकार देने की मांग की गई है. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14,15,21, 15 और 29 का भी हवाला दिया गया है.

याचिका में इस्लाम के मूल आधार यानी कुरान और हज़रत मुहम्मद साहब के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने कभी मर्द औरत में फर्क नही रखा. बात सिर्फ अक़ीदे यानी श्रद्धा और ईमान की की है. कुरान और हज़रत ने कभी औरतों के मस्जिद (mosque) में दाखिल होकर नमाज़ अदा करने की कभी खिलाफत नहीं की, लेकिन कुरान को आधार बनाकर इस्लाम की व्याख्या करने वालों ने औरतों से भेदभाव शुरू कर दिया.