अमेरिका की नौकरी छोड़, 25 साल की उम्र में बनी सरपंच, ली 526 घरों की जिम्मेदारी…

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सरपंच
Sarpanch Bhakti Sharma

जानिए मध्यप्रदेश के भोपाल की पढ़ी-लिखी सरपंच भक्ति शर्मा की कहानी, सरपंच चुनाव प्रचार का पहला दिन था उस दिन 12 किलोमीटर नंगे पैर चल रही थी तभी शाम के वक्त कच्चे मकान में मुझे एक परिवार मिला, छोटी बेटी और साइड में खड़े दो बच्चे दिखे। उन बच्चों के पिता ने अपनी जेब से 100 रुपए मुझ पर वार कर मुझे दे दिए। में उन्ही मना नहीं कर पाई क्योंकि अगर में ऐसा करती तो उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँच सकती थी। और मेने वो पैसे ले लिए, जब घर पहुंची। खाना खाने बैठी तो मन में बार-बार सवाल आ रहा था कि आज ये 100 रुपए जिस घर से मैं ले आई हूं, आज उन लोगों ने क्या खाना खाया होगा? ये घटना मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट बनी और सोचा कि अपने देश के लोगों की ही सेवा करनी है फिर मैंने सरपंच का चुनाव लड़ा।

भास्कर वुमन से बातचीत के दौरान 32 साल की भक्ति बताती है कि ‘जॉइंट फैमिली में मैं इकलौती लड़की रही, लेकिन जस्टिस के साथ पाला गया। भोपाल के नूतन कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में एमए किया। कॉलेज की प्रेजिडेंट भी रही, इसके बाद मैं सिविल सर्विसिस की तैयारी करने दिल्ली आ गई, लेकिन यहां सभी पेपर क्लिअर नहीं हुए। जिससे निराशा हुई। इंटरनेशनल रिलेशन्स की भी तैयारी की, लेकिन तब तक मैं सरपंच बन गई थी और अब मेरे पास समय नहीं था कि मैं इस पढ़ाई को आगे करती। 2019 में ही में कानून की पढ़ाई खत्म की है। 25 साल की उम्र में मैं सरपंच बन गई।

25 साल की उम्र में सरपंच बनने की कहानी –
मेरी सरपंच बनने की कहानी बड़े ही अलग किस्म की है। मेरे चाचा अमेरिका में रहते हैं, जो चाहते थे कि मुझे अमेरिका में ही रहना चाहिए। अमेरिका में मुझे ही पीआर सेक्टर में नौकरी भी मिल गई और यहां मेरा परिवार भोपाल में खेतीबाड़ी करता है। मेरे पिता जी चाहते थे कि मैं भी भारत में ही रहूं। पर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं यहां क्या करूंगी, तो उन्होंने कहा कि हम सब खेतीबाड़ी करते हैं तो तुम भी वही करना। जब तुम मोटरसाइकिल चला लेती हो तो ट्रैक्टर भी चला लोगी। तो मैं यहीं रुक गई। 2014 में सरपंच का चुनाव होना था, लेकिन वो 2015 में हुआ।

अमेरिका की नौकरी छोड़ बनीं गांव की सरपंच हर घर में चर्चा हो रही थी कि चुनाव आ रहे हैं तो इस बार किसको खड़ा करना है। गांव के लोगों ने कहा कि इस बार कोई पढ़ा-लिखा सरपंच चाहिए, जो अपने गांव का विकाश कर पाए। जब वुमन सीट आई तो लोगों ने कहा कि भक्ति बाई चुनाव लड़ लेंगी। मध्यप्रदेश में महिलाओं को रिस्पेक्ट से बाई कहा जाता है। मैं सीविल सर्विसिस पास नहीं कर पाई थी लेकिन मुझमें देश की सेवा करने का जुनून हमेशा से था। जब गांव में गरीबी देखी तो लगा कि मुझे कुछ ऐसा करना है जहां मेरे पास पावर हो और मैं लोगों की मदद कर सकूं। मैं चुनाव जीत गई। नौकरी छोड़ दी। गांव क्या होता है, ये सरपंच बनने के बाद समझ आया।

महिलाओं को खुद की ताकत को समझना होगा –
मैं हमेशा ऐसा मानती आई हूं कि हमारे पुरुष समाज में महिलाओं को खुद की ताकत को समझना होगा। उन्हें अपनी पॉजिटिव एनर्जी को इकट्ठा करके उसे इस्तेमाल करके उसका प्रोडक्टिव यूज करना होगा। समाज में चाहें महिला हो या पुरुष वो आप पर बातें बनाएंगे। ऐसे में आपको खुद तय करना है कि आपको उन बातों को कैसे लेना है। आप सभी को सफाई न देते घूमें। आप खुद, परिवार को और अपने ईश्वर को एक्सप्लेन करो और किसी को मत करो।

महिलाओं के लिए राजनीति ज्यादा मुश्किल –
जिस उम्र में बच्चे खूब मस्ती करते हैं, शादी के बारे में सोचते हैं, उस उम्र में मेरे ऊपर 526 घर और 3 हजार लोगों की जिम्मेदारी आ गई थी। जब में प्रचार के लिए गांव में गई। हर घर की स्थिति देखी, तब लगा कि अपने गांवों को ही पहले अमेरिका बनाना होगा। इसी बीच यह भी समझ आया कि महिलाओं को पॉलिटिक्स में फिट-इन करने की कोशिश की जाती है। 25 साल की उम्र में उस समय लगता था कि मुझे सब कुछ आता है, मैं बहुत होशियार हूं, लेकिन सिस्टम वैसे काम नहीं करता जैसे हम सोचते हैं। मैंने सीखा कि मुझे खुद के बल पर फैसले लेने होंगे, किसी की मदद नहीं लेनी है।

वही मेरे पिता जी ने कह दिया था कि तुम्हारे सरपंच बनने के लिए उठाये गए कदम में हम तुम्हारी कोई मदद नहीं करेंगे, क्योंकि वो चाहते थे कि मैं खुद सबकुछ सीखूं। मेरी फैमिली ने शुरुआत के 6 महीने मेरी मदद की, सिर्फ ये समझाने के लिए कि सरपंची कैसे काम करती है। मेरे परिवार में कोई राजनीति में नहीं है। सोशल वर्क ज्यादा करते हैं। मैं इकलौती थी जो राजनीति में आई। मेरे ऊपर मेरे पिता और दादा का बहुत प्रभाव रहा, लेकिन अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं।

चुनाव प्रचार-प्रसार में किया संघर्ष –
सरपंच के चुनाव बहुत कठिन है। ये चुनाव इस बात पर लड़ा जाता है कि भक्ति बाई ने हमारे घर पानी नहीं पिया तो हम इन्हें वोट नहीं देंगे या मैं किसी के घर शादी में नहीं गई तो वे वोट नहीं देंगे। सरपंच का चुनाव पॉलिटिकल चुनाव नहीं होता ये वन टू वन होता है। ये चुनाव किसी पार्टी के तहत नहीं हुआ था। मध्यप्रदेश में चुनाव लोगों के बीच होता है। बरखेड़ी अब्दुल्ला पंचायत में चार गांव आते हैं। यहां रास्ते पथरीले हैं। प्रचार करते-करते मेरे पैर छिल गए, खून निकलने लगा तो नंगे पैर चलने लगी। चुनाव प्रचार के दौरान जिस व्यक्ति ने मुझे 100 रुपए दिए थे वो मैंने आज भी संभाल कर रखे हैं। प्रचार के बाद जब घर आई तो यहां जश्न का माहौल था, लेकिन मैं उस परिवार के बारे में सोच रही थी कि उन्होंने पता नहीं आज खाना खाया होगा या नहीं। यही नहीं बुजुर्ग महिलाएं जिनके हाथ काम करते-करते कट जाते हैं और जब वे आपके गालों को टच करती हैं तो वो टच भी प्यार लगता है। वो आपके माथे को चूमकर बुंदेलखंडी में कहती हैं कि तुम्हरी वजह से घर में आज खानो आओगो। मैंने बहुत महिलाओं के आंखों में आंसू देखे हैं। बच्चों को मुझे गले लगाते देखा है। 25 साल की लड़की पर कोई भरोसा नहीं करना चाहता था लेकिन आज करते हैं। भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी हूं। सरपंच कोई 9-5 जॉब नहीं है। मैं रात के दो बजे तक घर वापस आई हूं।

18 लड़कियों ने लोन से किये खुद के काम शुरू –
पिछले 6 सालों में पंचायत में 70 प्रतिशत पक्के मकान बनवाए गए है। हमारी पंचायत ओडीएफ है। हमने करीबन पौने तीन करोड़ की सड़कें बनवाई हैं। हमने 11 एसएचजी में कौशल विकास के तहत प्रशिक्षण दिया है। पिछले 6 साल में छेड़छाड़, भ्रष्टाचार का एक भी केस सामने नहीं आया है। हमने युवाओं को नशा न करने की सलाह दी है। हम किसानी पर काम कर रहे हैं। अगले कुछ दिनों में डिजिटल क्लासिस शुरू करने वाली हूं। जो एक तरह का डिजिटल स्कूल होगा। मेरे टेन्योर के दौरान कोई भी बच्चा कुपोषण से नहीं मरा। 18 लड़कियों ने लोन लेकर अपने खुद के काम शुरू किए हैं।