बचपन गुजरा गरीबी में, 9वीं में शादी, 3 बच्चों को अकेले पाला, अब दे रही पति की दूसरी पत्नी साथ…

बचपन गुजरा गरीबी में, 9वीं में शादी, 3 बच्चों को अकेले पाला, अब दे रही पति की दूसरी पत्नी साथ...

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आलिस किस्कू
आलिस किस्कू

जीवन जीने के लिए सबको एक साथी की जरुरत हमेशा पड़ती है वो कोई भी हो सकता है वो आपका परिवार हो सकता है दोस्त हो सकते है लेकिन अपने जीवन में एक इंसान अहम् भूमिका निभाता है वो है जीवन साथी. पति या पत्नी दोनों का जीवन एक दूसरे के बिना अधूरा है चलिए आज जानते एक ऐसी महिला के बारे में जिनकी 9वीं क्लास में हुई शादी हुई, 3 बच्चे हुए और उसके बाद पति ने दूसरी शादी कर ली, उन्होंने 3 बच्चों को अकेले पाला और अब सौतन का भी काम में हाथ बंटाती है. चलिए देखते हैं दैनिक भास्कर की यह रिपोर्ट…

बिहार के दिघलबैंक गांव की आदिवासी संथाल आलिस किस्कू का कहना है कि माँ बाप के घर में बचपन गरीबी में बिता, जिस घर में शादी हुई वहां भी सूखा नहीं मिला. शादी के कुछ साल बाद ही अलग होना पड़ा, तीन बच्चों को अकेले दम पर गांव में रहकर पढ़ाना आसान नहीं था, लेकिन संघर्ष को जैसे मैंने जीया था और अब उसी की बदौलत ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हूं।’

आलिस आदिवासी महिला हैं। उन्होंने इंटर तक की पढ़ाई और अपने बच्चों की पढ़ाई साथ-साथ कराई। आज उनके बेटे की सरकारी नौकरी है।

जब पति ने की दूसरी शादी –
लगभग 53 साल की आलिस वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, ‘जिस परिवार में मेरा जन्म हुआ वहां गरीबी ही जीवन रहा। करीब 9वीं में रही होंगी, जब शादी कर दी गई। सोचा था बचपन नून रोटी के लिए तरसा है तो ब्याह के बाद अच्छे दिन आएंगे।
पर मेरी इतनी अच्छी किस्मत कहां। चूड़ी, बिंदी, बिछिया, माहवार और हाथों की मेहंदी का रंग हटने से पहले तीन बच्चों को लेकर अपनी मां के घर वापस आना पड़ा क्योंकि पति ने दूसरी शादी कर ली।
मेरे जीवन में घटी इस दुर्घटना के बाद भी मैं ससुराल वालों से लड़ी या झगड़ी नहीं, क्योंकि मेरे आगे तीन बच्चे थे और मुझे इनका भविष्य संवारना था। अगर कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ती तो बच्चों का भविष्य बर्बाद हो जाता। एक लड़की जो खुद उम्र से अभी बहुत बड़ी नहीं हुई थी, उसे एक साथ तीन बच्चे संभालने पड़े। बच्चों की जिम्मेदारी ने जैसे मुझे वक्त से पहले बड़ा बना दिया था।

में नहीं चाहती कोई और महिला को मेरे जैसा संघर्ष करना पड़े –
आलिस अपनी आपबीती सुनते हुए आगे कहती है ‘मैंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है, लेकिन अब नहीं चाहती कि कोई और महिला मेरे जैसा संघर्ष करे।’
आलिस कहती हैं, ‘मैंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है, लेकिन अब नहीं चाहती कि कोई और महिला मेरे जैसा संघर्ष करे।’
ससुराल की दहलीज़ पार कर मैंने बच्चे मां-पिता के पास छोड़ दिए, लेकिन वे खुद भी घास, फूस के घर में रहते, ऐसे में कैसे उनका पेट पालते। मैंने मायके से थोड़ी दूर स्कूल में क्लर्क का काम किया। ‘मैडम लोगों’ की फाइलों को इधर-उधर से देती रहती। अपनी इंटर तक की पढ़ाई और बच्चों की पढ़ाई साथ-साथ कराई।
एक वक्त की रोटी ही दे पाई बच्चों को

बच्चों को एक वक़्त का खाना नसीब लेकिन कभी शिकायत नहीं करते –
इंसान एक दिन में तीन वक्त का खाना खाता है, लेकिन मेरे बच्चों को मैं एक वक्त का खाना ही मुहैया करा पाती। वे बेचारे कभी मुझसे शिकायत भी नहीं करते और डिमांड भी नहीं। जैसा उन्हें पहनने को मिलता पहन लेते और जैसा खाने को देती वैसा खा लेते।
काम मिलने से जिंदगी थोड़ी बेहतर हुई ही थी कि जैसे वक्त से मेरी खुशियां देखी ही नहीं गईं। वे माता-पिता जो मेरे बच्चों के भी संरक्षक थे, अब वे इस दुनिया में नहीं रहे। मेरी जिंदगी का एकमात्र सहारा मुझसे छिन गया। एक बार फिर मैं रोते-बिलखते रह गई।
जिंदगी के ये सारे उतार-चढ़ाव शादी के कुछ साल के भीतर ही देख लिए थे। मेहनत, मजदूरी की, पर बच्चों का पढ़ाना बंद नहीं किया। डबल काम करके बच्चों को होस्टल में डालकर पढ़ाया, क्योंकि मैं हमेशा उनके साथ नहीं रह सकती थी।

दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ है आलिस –
आलिस आगे बताती हैं कि उन्होंने ‘जीविका’ के साथ मिलकर दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ काम किया। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की शादी बिना दहेज के की। दोनों बेटियों की शादी के बाद बेटे ने कहा कि ‘मां हमारी पुश्तैनी जमीन सब बेच दी जाएगी, पापा के पास वापस चलो।’ हम लोग वापस ससुराल में आ गए। यहां आने के एक साल बाद पति का देहांत हो गया, क्योंकि वे एक साल से बीमार थे।
2013 में ससुराल में आने के बाद मुझे ‘जीविका’ से जुड़ने का मौका मिला। जीविका बिहार सरकार की परियोजना है। इस परियोजना से बिहार सरकार महिला सशक्तिकरण और गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को ऊपर उठाना चाहती है।

आलिस गांव की महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरुक करती हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रही हैं।

‘जीविका’ ने बदली जिंदगी –
2014 में ‘जीविका’ के साथ जुड़कर मुझे स्वयं सहायता समूह के साथ जुड़ने का मौका मिला। अब मेरे समूह में 12 महिलाएं हैं। यहां बचत के बारे में जानने से लेकर दहेज, बाल विवाह और शिक्षा पर काम किया। मेरी माली हालत यहां आकर ही सुधरी।
जब महिलाओं का सहारा मिला तो लगा कि मैं अब अकेली नहीं हूं। अपने समहू की महिलाओं को मैंने समझाया कि वे अकेली नहीं हैं, उन्हें अपनी जिंदगी का उदाहरण दिया और बताया कि बेटियों को शादी के लिए नहीं जिंदगी जीने के लिए, आत्मनिर्भर बनाने के लिए पढ़ाएं।

सौतन का भी देती हैं हर काम में साथ –
आज बेटियां अपने घर पर हैं, बेटे की सरकारी नौकरी लग गई है। अब मैं नाती, पोता वाली हो गई हूं। अपनी सौतन को भी जीविका से जोड़ा। अब उसके और मेरे बच्चे दोनों कमा खा रहे हैं और वह भी जीविका के जरिए कमा रही है। हमारे बीच किसी तरह का झगड़ा नहीं है। क्योंकि वह भी एक महिला है, एक इंसान है और इंसानियत की सेवा करना ही मेरा धर्म है।