Ayah’s Home: भारतीय महिलायें जो ब्रिटेन के बच्चों की आया बनी, गंदे ठिकानों में रहने को मजबूर थीं…

Ayah"s Home: ब्रिटेन की भावी पीढ़ियों की परवरिश करने गई भारतीय औरतें भीख मांगने, गंदे ठिकानों में रहने को होती थीं मजबूर...

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Ayahs Home
Ayah"s Home: ब्रिटेन की भावी पीढ़ियों की परवरिश करने गई भारतीय औरतें भीख मांगने, गंदे ठिकानों में रहने को होती थीं मजबूर...

ब्रितानी साम्राज्य के चढ़ते दिनों में भारत और एशिया के दूसरे हिस्सों से बच्चों के लालन-पालन के लिए हज़ारों औरतों को लंदन लाया गया था- लेकिन इनमें से बहुत सी ‘आया’ को बाद में बेसहारा उनके हाल पर छोड़ दिया गया था. अब, उस मकान (Ayah’s Home) को जहां ये रहा करती थीं, ‘ब्लू प्लाक’ से स्मारक बनाया जा रहा है.’ब्लू प्लाक’ स्कीम यूनाइटेड किंगडम की चैरिटी संस्था ‘इंग्लिश हेरिटेज’ चलाती है और इस योजना में वो लंदन के उन भवनों (Ayah’s Home) को सहेजती है जो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक हस्तियों से गहरा संबंध रखते हों.

ये आया कौन थीं

इनमें से अधिकतर महिलाएं भारत, चीन, हांग कांग, ब्रितानी सीलोन- अब श्रीलंका, बर्मा- अब म्यांमार, मलेशिया और जावा- इंडोनिशया के एक हिस्से से आई थीं. अक्सर परिवार बच्चों की देखरेख के लिए आया को अपने साथ ब्रिटेन ले आते थे, इतिहासकार और ‘एशियंस इन ब्रिटेनः 400 ईयर्स आफ हिस्ट्री’ की लेखिका रोज़ीना विसराम कहती हैं, “आया और आमा असल में घरेलू कामगार थीं और औपनिवेशिक भारत में ब्रितानी परिवारों के लिए मज़बूत सहारा थीं. वे बच्चों की देखभाल करती थीं, उनका मनोरंजन करती थीं, उन्हें कहानियां सुनाती थीं, और पालना झुलाकर सुलाती थीं.” वे कहती हैं,

पैसे या घर वापसी का टिकट दिए बिना बेसहारा छोड़ देते

“आमतौर पर उन्हें परिवार अपने खर्चे पर वापसी का टिकट भी देते थे.” लेकिन सब इतनी किस्मतवाली नहीं होती थीं- कई को काम से निकाल दिया जाता था और उन्हें नौकरी पर रखने वाले उन्हें पैसे या घर वापसी का टिकट दिए बिना बेसहारा छोड़ देते थे. उनमें से बहुत सी इसलिए वहां रहने को मजबूर होती थीं कि वापसी की यात्रा में उनका साथ देने के लिए कोई परिवार नहीं मिलता था. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल में साहित्य और प्रवासन के लेक्चरर फ्लोरियन स्टैडलर का कहना है, “इसके कारण आया को अपने हाल पर रहना पड़ता था.” फ्लोरियन स्टैडलर ने इस विषय पर विसराम के साथ काम किया है.

औरतें अक्सर स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर घर वापसी के लिए मदद की गुहार लगाती थीं- इनमें से कई गंदे ठिकानों में रहने को मजबूर होती थीं. “और जब उनके पास पैसे खत्म हो जाते थे तो उन्हें इन सस्ती जगहों से भी निकाल बाहर कर दिया जाता था. कइयों को भारत लौटने के लिए भीख मांगने को मजबूर होना पड़ा था.”

आया घर एल्डगेट में कब में बना था?

ओपन यूनिवर्सिटी के ‘मेकिंग ब्रिटेन’ रिसर्च प्रोजेक्ट के अनुसार, “ऐसा अनुमान है कि आया घर (Ayah’s Home) एल्डगेट में 1825 में बना था.” ये एलिज़ाबेथ रॉजर्स नाम की महिला ने बनाया था. उनके निधन के बाद यह घर (Ayah’s Home) एक जोड़े ने ले लिया था जिसने इसे आया के आवास के तौर पर बनाया. वे इस घर को एक रोज़गार केंद्र की तरह चलाते थे, और परिवार यहां दाइयों की तलाश में आते थे.

“हर साल यहाँ 200 तक आया ठहरती थीं

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जैसे-जैसे साम्राज्य का सूरज चढ़ता गया, इंग्लैंड और भारत के बीच नियमित यात्राएं होने लगीं- और इसी के साथ ब्रिटेन आने वाली दाइयों की संख्या भी बढ़ती गई. डॉक्टर विसराम के अनुसार, “हर साल यहाँ 200 तक आया ठहरती थीं. कुछ तो चंद दिनों के लिए ठहरतीं और कुछ महीनों तक.”

आया को अपने ठहरने का खर्च नहीं देना होता था. डॉक्टर विसराम बताती हैं, “स्थानीय चर्चों से चंदा मिलता था. ऐसी दाइयां भी थीं जिनके पास वापसी का टिकट तो था लेकिन पैसों की कमी से या कोई साथ जाने वाला नहीं मिलने के कारण वे घर नहीं लौट सकीं- ऐसे मामलों में आया घर (Ayah’s Home) की मेट्रॅन उस टिकट को किसी ऐसे परिवार के हाथों बेच देती थीं जिन्हें भारत की समुद्री यात्रा पर उनकी सेवाओं की ज़रूरत होती थी जिससे कुछ पैसे जमा हो जाते थे.”

आया घर सिर्फ एक हॉस्टल या शरण की जगह नहीं थी.

आया घर (Ayah’s Home) सिर्फ एक हॉस्टल या शरण की जगह नहीं थी. बल्कि डॉक्टर स्टैडलर कहते हैं कि इनका एक खास मक़सद इन आया को ईसाई बनाने की कोशिश करना भी था. उन्होंने कहा, “लेकिन हमें सही से पता नहीं कि इन दाइयों में से कितनी धर्म परिवर्तन कर इंग्लैंड में ईसाई बन गईं क्योंकि इसका कोई रिकॉर्ड है नहीं. इस बात का भी कोई दस्तावेज़ नहीं है कि इंग्लैंड में वास्तव में इन्हें ईसाई धर्म अपनाने पर मजबूर किया गया था.”

साम्राज्य के पतन के साथ आया की ज़रूरत कम होती गई

बीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के साथ आया की ज़रूरत कम होती गई. 4 किंग एडवर्ड्स रोड के मकान को एक निजी आवास में बदल दिया गया. फरहाना मामूजी ने 2018 में आया घर (Ayah’s Home) के बारे में पहली बार बीबीसी की उस डॉक्यूमेंट्री में सुना जिसका नाम था- ‘अ पैसेज टू ब्रिटेन.’ इसमें हैकनी स्थित उस किराया घर की छोटी सी चर्चा थी- मामूजी वहीं पास में रहती थीं. ब्रितानी इतिहास में आया ने अहम भूमिका निभाई है

दो बच्चों के साथ एक आया

“पूर्वी लंदन में रहने वाली एक दक्षिण एशियाई महिला के नाते मुझे इन आया से एक जुड़ाव महसूस हुआ और उनकी अनकही कहानी जानने की इच्छा हुई.” ये बताते हुए फरहाना मामूजी कहती हैं कि उन्होंने उस इमारत को देखने का इरादा कर लिया. “मुझे इस बात पर बहुत गुस्सा आया कि दुनिया भर की अनेक एशियाई महिलाओं के लिए जो जगह इतनी खास थी उसके बारे में बताने के लिए कुछ नहीं था. तब ही मुझे यह भी लगा कि मुझे इसके लिए कुछ करना चाहिए.”

1850 में दो बच्चों के साथ एक भारतीय आया

इस म्यूज़ियम की मैनेजर नीति आचार्य कहती हैं कि उन्होंने “विभिन्न स्रोतों से इस घर (Ayah’s Home) में रहने वाले लोगों की पहचान तय करने की कोशिश की. इन स्रोतों में 1878 से 1960 तक यूनाइटेड किंगडम आने वाले और यहां से जाने वाले लोगों की लिस्ट, जनगणना रजिस्टर और लेखागार के स्रोत शामिल थे.” वे कहती हैं, “इन सभी तरह के स्रोतों से मिली छोटी-छोटी जानकारी से वह कहानी बुनने में मदद मिली जिससे एक बड़ी तस्वीर उभरकर सामने आई.” लेकिन यह चुनौती भरा काम था क्योंकि दाइयों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है.

अभिलेखागारों में उपलब्ध जानकारी उन परिवारों के बारे में है जो आया और आमा की सेवा लेते थे और खुद उन औरतों के बारे में नहीं. अक्सर ईसाई नाम के कारण उस औरत की पहचान मिट गई जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था या जिन्हें कोई पारिवारिक नाम दे दिया जाता जैसे आया बर्ड.” फरहाना मामूजी और दूसरों को यह उम्मीद है कि ब्लू प्लाक मिलने से इन भुला दी गई औरतों की चर्चा बढ़ेगी. वे कहती हैं, “सच बात तो यह है कि ये औरतें इस सम्मान की हक़दार हैं.” ब्रितानी इतिहास में आया ने अहम भूमिका निभाई है