क्या कांग्रेस दे पायेगी महिलाओं को 33% आरक्षण, आखिर मोदी सरकार ने क्यों नहीं दिया?

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33% आरक्षण 33% Reservation
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  • संसद में महिलाओं का औसत देखें तो विश्व का औसत जहां 22.6 फीसदी है। वहीं भारत का औसत केवल 12 फीसदी है।

देश में चुनावी माहौल है सभी राजनीतिक पार्टिया सियासी लड़ाई लड़ रही है देश मे रैलियों का दौर है बड़े-बड़े नेता जनता से सीधे रूबरू हो रहे है, अपने भाषणों में दूसरी पार्टी को नीचा दिखाने की या कमजोर साबित करने की हरसंभव कोशिश कर रहे है जनता से बड़े बड़े वादे किए जा रहे है उन्हें सपने दिखाए जा रहे है। सत्ता पाने के लिए जी तोड़ कोशिश की जा रही है लेकिन इन सबके बीच देश का एक बहुत बड़ा तबका है महिलाओं का उनके लिए कुछ खास घोषणा होती नही दिख रही।
लेकिन हाल ही में कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र जारी किया है और इस घोषणपत्र में राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने कहा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण (33% Reservation) लागू किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण (33% Reservation) का लाभ मिलेगा और ग़रीबों को ‘न्यूनतम आय योजना’ (Minimum Income Guarantee Scheme) का वादा भी किया। बताया कि पैसा परिवार की गृहिणी के अकाउंट में आएगा.

राहुल गांधी ने महिलाओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘जो न्याय योजना होगी उसके 72,000 रुपये जो बैंक खाते में जाएंगे, वो आपके नाम में जाएंगे. घर में जो महिला होगी, उसके बैंक खाते में सीधा पैसा जाएगा..तो न्याय की शुरुआत आपसे होगी.’ राहुल गांधी ने कहा, ‘हम संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का काम करेंगे. 2019 का चुनाव जीतने के बाद 33 प्रतिशत आरक्षण हम आपको दे देंगे और केंद्र सरकार में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को रोजगार में दिया जाएगा.’

चुनावी माहौल में प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिये वादे तो बड़े बड़े कर देते है लेकिन चुनाव जीतने के बाद पूरे नही कर पाते वैसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने महिलाओ के हित की बात तो की है मगर क्या वो सत्ता में आते है तो अपने वादे को निभा पाएंगे या फिर ये सिर्फ जुमला साबित होगा ? महिलाओं को लोकसभा विधानसभा में आरक्षण की बात कोई नई नही है पहले भी ऐसे वादे किए जा चुके है मगर अभी तक ये लागू नही हो पाया है आइये जानते है महिलाओं के आरक्षण बिल के बारे में –

महिला आरक्षण बिल
संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का बिल 2010 में पास करा लिया गया था लेकिन लोकसभा में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों के भारी विरोध की वजह से ये बिल पास नहीं हो सका। इसकी वजह है दलित, पिछड़े तबके की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग। कांग्रेस के पास 2010 में अपने दम पर बहुमत नहीं था लेकिन मोदी सरकार के पास ऐसी कोई मजबूरी नही थी। फिर भी महिलाओं को उनका हक देने देने में मोदी सरकार नाकामयाब रही।

सरकार चाहे कोई भी हो हमेशा महिलाओं के हक की बात तो करती है है मगर हक दिलाती नही है तो क्या हम ये माने की सरकार हमेशा महिलाओं के हक को लेकर जुमलेबाजी करती है
संसद में महिलाओं का औसत देखें तो विश्व का औसत जहां 22.6 फीसदी है। वहीं भारत का औसत केवल 12 फीसदी है।

हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान ही इस मामले में हमसे आगे है पाकिस्तान में संसद में 20.6 फीसदी महिला सांसद है और नेपाल में 29.5 फीसदी महिलाएं संसद में हैं। अफगानिस्तान में 27.7 फीसदी और चीन की संसद में 23.6 फीसदी महिला सांसद हैं।

संसद में महिला आरक्षण बिल क्यों लटका? लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद फिर क्या दिक्कत रही? क्या पार्टियों में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है और पुरुषवादी मानसिकता की वजह से टालमटोल की जा रही है। क्या महिला आरक्षण बिल आगे भी ऐसे ही लटका रहेगा? ये कुछ अहम सवाल है जो हमे हमारी सरकार से पूछने चाहिए।

ये बिल 1996 में पहली बार पेश हुआ था और 2010 में राज्यसभा से पास हो गया था लेकिन लोकसभा से पास नहीं हुआ, सपा, बसपा और आरजेडी का विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग के चलते ये बिल पास नहीं हो पाया।
राजनीति में महिला भागीदारी कम होने का कारण है कि महिला आरक्षण बिल 20 साल से अटका हुआ है। संसद में महिला आरक्षण बिल 1996 में देवेगौड़ा सरकार ने पहली बार पेश किया था और इसका कई पुरुष सांसदों ने भारी विरोध किया था। फिर साल 2010 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में दोबारा पेश होने के बाद राज्यसभा में बिल पास हुआ लेकिन लोकसभा में आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया। इतना ही नहीं लोकसभा में महिला आरक्षण बिल की कॉपी फाड़ी गई। महिला आरक्षण बिल के तहत संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव है। 2010 में राज्यसभा में बिल पास हुआ लेकिन कांग्रेस लोकसभा में बिल पास नहीं करा पाई क्योंकि कांग्रेस के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था। लेकिन बीजेपी के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत था और राज्यसभा में दोबारा बिल पास कराने की जरूरत नहीं थी तो सरकार ने इसे पास क्यों नहीं कराया ये सवाल उठना लाजिमी है।

हालांकि विरोधियों की दलील है कि दलित, ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए और 33 फीसदी आरक्षण में अलग से कोटा होना चाहिए। सवर्ण और दलित, ओबीसी महिलाओं की सामाजिक हालत में फर्क होता है और दलित, ओबीसी महिलाओं ने ज्यादा शोषण झेला है। महिला बिल के रोटेशन के प्रावधानों में विसंगतियां हैं जिसे दूर करना चाहिए और फिर बिल पास कराना चाहिए। 1997 में जेडीयू नेता शरद यादव का बयान आया था कि क्या आपको लगता है कि परकटी महिलाएं हमारे समाज की महिलाओं के बारे में बात कर पाएंगी।

हम 21स्वी शताब्दी में जी रहे है लेकिन आज भी हमारा समाज पुरुष प्रधान ही है महिलाएं की हिस्सेदारी हर क्षेत्र में पुरुषो से बहुत कम है महिलाओं पर हो रहे शोषण का एक बड़ा कारण भी शायद यही है महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार नही है । हाल ही में भारतीय महिला टी-20 टीम की कप्तान हरमन कौर ने एक इंटरव्यू में कहा कि महिलाओं की समस्या का एक ही हल है। उन्हें राजनीति में 50 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि जो नेता महिलाओं के हक की सुरक्षा की बात करे जो ऐसी सोच रखे उन्ही नेताओ को वोट मिलना चहिये।

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता ( जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं)

कुलदीप सैनी के द्वारा